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#नैनीताल

देश में सरकारी अस्पतालों में सुविधा का अकाल:

यूं तो सरकारों की तरफ से गांव-गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, फिर सामूहिक, स्वास्थ्य केंद्र, फिर सिविल अस्पताल के साथ जिला स्तर पर भी बड़े अस्पताल बनाए गए हैं। लेकिन वहां यदि देखा जाए तो कहीं पी.एच.सी. में डाक्टर नहीं केवल फार्मासिस्ट के सहारे काम चल रहा है। कहीं सिविल …

By Hindi News 24x7 - News Editor
Last Updated: 19 अप्र, 2023
देश में सरकारी अस्पतालों में सुविधा का अकाल:

यूं तो सरकारों की तरफ से गांव-गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, फिर सामूहिक, स्वास्थ्य केंद्र, फिर सिविल अस्पताल के साथ जिला स्तर पर भी बड़े अस्पताल बनाए गए हैं।

लेकिन वहां यदि देखा जाए तो कहीं पी.एच.सी. में डाक्टर नहीं केवल फार्मासिस्ट के सहारे काम चल रहा है।

कहीं सिविल अस्पताल में लैबोरेट्री है तो टैक्नीशियन नहीं।

कहीं एक्सरे मशीन है तो उसे चलाने वाला आप्रेटर नहीं।

यहां तक कि बड़े जिला स्तरीय अस्पतालों में भी पूरे टैस्टों की सुविधा नहीं है।

अल्ट्रासाऊंड आदि का भी प्रावधान नहीं है।

आपरेशन थिएटर बढिय़ा हैं तो सर्जनों की कमी है।

किन्हीं जिला मुख्यालयों पर तो विशेषज्ञ डाक्टर एवं सर्जनों की भरमार है तो कई जिला मुख्यालयों पर कई विशेषज्ञ नहीं हैं।

कहीं आप्रेशन थिएटर भी हैं, सर्जन भी हैं तो एनैस्थीसिया देने वाला डाक्टर नहीं है।

कुल मिलाकर ऐसी हालत में मरीजों को फिर निजी अस्पतालों में मजबूरन जाना पड़ता है।

वहां महंगे इलाज करवाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

सरकारी अस्पताल में जाकर भी मरीजों को बाहर से टैस्ट करवाना, एक्सरे व अल्ट्रासाऊंड इत्यादि करवाने पड़ते हैं।

इससे बेहतर लोग अब सीधे ही निजी अस्पतालों में जाने लगे हैं क्योंकि वहां भले ही अधिक पैसा खर्च होगा लेकिन सारा काम एक ही छत के नीचे हो जाएगा।

सरकार द्वारा बनाए गए हिमकेयर कार्ड या आयुष्मान कार्ड इत्यादि का लाभ भी लोगों को सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ निजी अस्पतालों में बाकायदा मिल रहा है।

इन सभी के बीच भले ही सरकारी डाक्टर हो या प्राइवेट, इलाज के दौरान मरीज गंभीर हो जाए या उसकी मृत्यु हो जाए तो उसका सारा जिम्मा डाक्टरों के ऊपर आ जाता है।

ऐसे में कई बार डाक्टरों को लोगों की खरी-खोटी सुनने के साथ-साथ कई तरह की प्रताडऩा भी झेलनी पड़ती है।

ऐसे आतंक के माहौल में डाक्टर कैसे इलाज कर पाएंगे।

एमरजैंसी में आए मरीज को जिंदगी व मौत के बीच जूझते हुए देख डाक्टर का मन उसका इलाज करने को तो करता है लेकिन इलाज के दौरान कुछ ऐसा-वैसा हो जाने के डर से अब एमरजैंसी में डाक्टर मरीज को देखकर इलाज करने से कतराने लगे हैं।

सरकारी अस्पतालों में डाक्टर मरीज का चैकअप कर उसका इलाज न हो पाने की स्थिति में पी.जी.आई. आदि बड़े संस्थान में रैफर कर देते हैं।

पिछले कुछ समय से ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें डाक्टरों को ऐसी हालत का सामना करते हुए भारी मानसिक एवं आर्थिक हानि उठानी पड़ी है।

ऐसा प्राइवेट डाक्टरों के साथ ही नहीं बल्कि सरकारी डाक्टरों के साथ भी होता है।

अनेक सरकारी डाक्टरों पर लोगों द्वारा अपने काम में कोताही के मामले दर्ज करवाए गए हैं।

जिनमें अधिकांश मामले स्त्री रोग विशेषज्ञ या जनरल सर्जनों के देखने में आए हैं।

लगभग एक दशक पूर्व किसी मामले को लेकर एक निजी अस्पताल में दिन-दिहाड़े कुछ लोगों द्वारा डाक्टर के साथ मारपीट की गई।

उसके अस्पताल की इतनी बुरी तरह से तोड़-फोड़ की गई कि उसे ठीक करवाते समय अस्पताल का नक्शा तक बदलना पड़ गया।

वहीं इतने बड़े सीनियर डाक्टर को देर रात्रि तक पुलिस की प्रताडऩा का शिकार होना पड़ा।

सालों से यह मामला अदालतों में चल रहा है।

इसी तरह से सरकारी डाक्टरों को भी कुछ ऐसी ही दशा से कई बार गुजरना पड़ता है।

ऐसे मामलों से तंग आकर कई बार डाक्टर वी.आर.एस. तक ले लेते हैं।

कई बार कई अस्पताल केवल धंधा एवं मुनाफा कमाने के लिए चलाए जा रहे होते हैं जिनमें सुविधाएं पूरी नहीं होतीं व मरीज की हालत बिगड़ जाने पर उससे निपटने का हल भी उनके पास नहीं होता।

ऐसे में सरकार को निजी अस्पतालों की जांच-पड़ताल एवं निरीक्षण नियम एवं कायदे कानूनों के साथ-साथ समय पर करते रहना चाहिए।

जो निजी अस्पताल मापदंड एवं सुविधाएं पूरी नहीं कर रहे उन पर कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।

वहीं इसे रोकने के लिए सरकारी अस्पतालों में पूरी सुविधाएं मिलें तो आम लोग निजी अस्पतालों का रुख न करके सरकारी अस्पतालों में जाने को प्राथमिकता देंगे।

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