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आज तृतीय नवरात्रि में होती है माँ चन्द्रघंटा की पूजा:

नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन ‘मणिपूर’ चक्र में प्रविष्ट होता है। लोकवेद के अनुसार माँ चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का …

By Hindi News 24x7 - News Editor
Last Updated: 24 मा, 2023
आज तृतीय नवरात्रि में होती है माँ चन्द्रघंटा की पूजा:

नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है।

इस दिन साधक का मन ‘मणिपूर’ चक्र में प्रविष्ट होता है।

लोकवेद के अनुसार माँ चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं।

ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं।

माँ का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है।

इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है।

इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है।

इनके दस हाथ हैं।

इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं।

इनका वाहन सिंह है।

इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है।

मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएँ विनष्ट हो जाती हैं।

इनकी आराधना सद्यः फलदायी है।

माँ भक्तों के कष्ट का निवारण शीघ्र ही कर देती हैं।

इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है।

इनके घंटे की ध्वनि सदा अपने भक्तों को प्रेतबाधा से रक्षा करती है।

इनका ध्यान करते ही शरणागत की रक्षा के लिए इस घंटे की ध्वनि निनादित हो उठती है।

माँ का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है।

इनकी आराधना से वीरता-निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होकर मुख, नेत्र तथा संपूर्ण काया में कांति-गुण की वृद्धि होती है।

स्वर में दिव्य, अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है।

माँ चंद्रघंटा के भक्त और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शांति और सुख का अनुभव करते हैंविद्यार्थियों के लिए मां साक्षात विद्या प्रदान करती है।

देवी साधक की सभी प्रकार से रक्षा करती है।

इस दिन सांवली रंग की ऐसी विवाहित महिला जिसके चेहरे पर तेज हो, को बुलाकर उनका पूजन करना चाहिए।

भोजन में दही और हलवा खिलाएँ।

भेंट में कलश और मंदिर की घंटी भेंट करना चाहिए।

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