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नैनीताल हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: HNB गढ़वाल यूनिवर्सिटी के कुलपति की नियुक्ति पर सवाल ?

नैनीताल/देहरादून (10 फरवरी 2026): उत्तराखंड के एकमात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय, हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (HNBGU) के कुलपति (VC) की नियुक्ति का विवाद अब नैनीताल हाईकोर्ट पहुंच गया है। कुलपति की नियुक्ति को अवैध बताते हुए उसे निरस्त करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने …

By Hindi News 24x7 - News Editor
Last Updated: 10 फ़र, 2026
नैनीताल हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: HNB गढ़वाल यूनिवर्सिटी के कुलपति की नियुक्ति पर सवाल ?

नैनीताल/देहरादून (10 फरवरी 2026): उत्तराखंड के एकमात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय, हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (HNBGU) के कुलपति (VC) की नियुक्ति का विवाद अब नैनीताल हाईकोर्ट पहुंच गया है। कुलपति की नियुक्ति को अवैध बताते हुए उसे निरस्त करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को नोटिस जारी किया है।

HNB गढ़वाल यूनिवर्सिटी के कुलपति की नियुक्ति पर सवाल; UGC से 3 हफ्ते में मांगा जवाब.

मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने UGC को निर्देश दिया है कि वह तीन सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करे। मामले की अगली सुनवाई के लिए 11 मार्च 2026 की तारीख तय की गई है।

प्रोफेसर नवीन प्रकाश नौटियाल ने जनहित याचिका दायर कर वर्तमान कुलपति प्रोफेसर प्रकाश सिंह की नियुक्ति को चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि यह नियुक्ति ‘केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम, 2009’ और ‘UGC विनियम, 2018’ (UGC Regulations 2018) का खुला उल्लंघन है।

योग्यता का उल्लंघन: UGC के विनियम 7.3 के अनुसार, कुलपति पद के लिए किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में कम से कम 10 वर्षों का अनुभव अनिवार्य है। IIPA का अनुभव मान्य नहीं: याचिका में तर्क दिया गया है कि प्रोफेसर प्रकाश सिंह का ‘भारतीय लोक प्रशासन संस्थान’ (IIPA) में चेयर प्रोफेसर का अनुभव विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के समकक्ष नहीं माना जा सकता। IIPA न तो कोई विश्वविद्यालय है और न ही UGC के मानदंडों द्वारा शासित संस्था है। विज्ञापन की शर्तें: शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी विज्ञापन में स्पष्ट रूप से ‘विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में 10 वर्ष’ की शर्त रखी गई थी। इसमें किसी भी तरह की समकक्षता (Equivalence) की गुंजाइश नहीं थी। संवैधानिक उल्लंघन: याचिकाकर्ता का कहना है कि चयन प्रक्रिया के बीच में पात्रता शर्तों को बदलना या शिथिल करना सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के खिलाफ है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करता है।

 

 

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