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मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए उत्तराखंड सरकार का नया कदम, हर जिले में बनेगी विशेष समिति

उत्तराखंड में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए सरकार अब स्थानीय समुदायों को समाधान की प्रक्रिया में सीधे शामिल करने की तैयारी कर रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर प्रदेश के हर जिले में मानव-वन्यजीव संघर्ष निवारण समितियां गठित करने की योजना बनाई जा रही …

By Hindi News 24x7 - News Editor
Last Updated: 25 जुल, 2026
मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए उत्तराखंड सरकार का नया कदम, हर जिले में बनेगी विशेष समिति

उत्तराखंड में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए सरकार अब स्थानीय समुदायों को समाधान की प्रक्रिया में सीधे शामिल करने की तैयारी कर रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर प्रदेश के हर जिले में मानव-वन्यजीव संघर्ष निवारण समितियां गठित करने की योजना बनाई जा रही है। इन समितियों में वन विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ पंचायत प्रतिनिधियों व प्रभावित क्षेत्रों के स्थानीय लोगों को भी शामिल किया जाएगा।

सरकार का उद्देश्य केवल वन्यजीव हमलों के बाद राहत और बचाव तक सीमित नहीं रहना है, बल्कि ऐसी रणनीति तैयार करना है जिससे संघर्ष की घटनाओं को पहले ही कम किया जा सके। स्थानीय लोगों से मिलने वाले सुझावों के आधार पर संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, निगरानी व्यवस्था और बचाव के उपाय तय किए जाएंगे।

उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष लंबे समय से बड़ी चुनौती बना हुआ है। पहाड़ी क्षेत्रों में गुलदार और भालू, जबकि मैदानी इलाकों में हाथी और बाघों के कारण कई बार इंसानों और वन्यजीवों के बीच टकराव की स्थिति बनती है। इन घटनाओं से जहां लोगों की जान को खतरा रहता है, वहीं खेती और ग्रामीणों की आजीविका भी प्रभावित होती है।

आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2000 से सितंबर 2025 तक राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष के कारण 1,256 लोगों की मौत हुई, जबकि 6,433 लोग घायल हुए। इस दौरान गुलदार के हमलों में सबसे अधिक मौतें दर्ज की गईं। इसके अलावा हाथी, बाघ और भालू के हमलों ने भी कई लोगों की जान ली है।

वन विभाग का मानना है कि हर क्षेत्र में संघर्ष के कारण अलग-अलग हैं। कहीं वन्यजीवों की आवाजाही ज्यादा है तो कहीं जंगल और आबादी के बीच बढ़ती गतिविधियां समस्या का कारण बन रही हैं। ऐसे में स्थानीय ग्रामीणों के अनुभव और जानकारी समाधान तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

प्रस्तावित समितियां अपने-अपने जिलों में संघर्ष प्रभावित इलाकों की पहचान करेंगी और ग्रामीणों से सुझाव लेकर योजनाएं तैयार करेंगी। इसमें जागरूकता अभियान, संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी, समय पर सूचना व्यवस्था और वन विभाग व ग्रामीणों के बीच बेहतर तालमेल जैसे कदम शामिल किए जा सकते हैं।

मुख्य वन संरक्षक (वन पंचायत) पराग मधुकर धकाते के अनुसार, बढ़ती घटनाओं को देखते हुए पंचायतों और स्थानीय लोगों को साथ लेकर चलना जरूरी है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर जिला स्तर की समितियों के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है और जल्द ही इसका स्वरूप तय किया जाएगा।

सरकार को उम्मीद है कि स्थानीय लोगों की भागीदारी से वन्यजीवों और इंसानों के बीच बढ़ते टकराव को कम करने में मदद मिलेगी और ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान अधिक प्रभावी तरीके से किया जा सकेगा।

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