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पीएम मोदी ने तब बिल्ली के गले में घंटी बांध दी, जब उन्होंने समान नागरिक संहिता को लागू करने का पक्ष लिया, संविधान में वॢणत समानता के महत्व पर डाला प्रकाश:

मुस्लिम तुष्टीकरण से तुष्ट रहने वाले और एक समान नागरिक संहिता के विरुद्ध अल्पसंख्यकों को भड़काने वाले दलों पर प्रहार करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘आप मुझे बताइए कि एक घर में एक सदस्य के लिए एक कानून और दूसरे सदस्य के लिए दूसरा कानून कैसे हो सकता है? क्या …

By Hindi News 24x7 - News Editor
Last Updated: 05 जुल, 2023
पीएम मोदी ने तब बिल्ली के गले में घंटी बांध दी, जब उन्होंने समान नागरिक संहिता को लागू करने का पक्ष लिया, संविधान में वॢणत समानता के महत्व पर डाला प्रकाश:

मुस्लिम तुष्टीकरण से तुष्ट रहने वाले और एक समान नागरिक संहिता के विरुद्ध अल्पसंख्यकों को भड़काने वाले दलों पर प्रहार करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘आप मुझे बताइए कि एक घर में एक सदस्य के लिए एक कानून और दूसरे सदस्य के लिए दूसरा कानून कैसे हो सकता है?

क्या वह घर चल पाएगा? जब वह घर नहीं चल पाता है तो ऐसी दोहरी प्रणाली से क्या देश चल पाएगा?

हमें इस बात को ध्यान में रखना होगा कि हमारे संविधान में भी सभी के लिए समान अधिकारों का उल्लेख किया गया है।

प्रधानमंत्री ने यह वक्तव्य विधि आयोग द्वारा इस संबंध में जनता और मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों की 30 दिन के भीतर राय मांगने के बाद दिया।

प्रश्न उठता है कि क्या मोदी सरकार समान नागरिक संहिता ला पाएगी? बिल्कुल ला सकती है। संविधान में इसका उल्लेख है।

अंबेडकर इसके प्रबल पक्षधर थे। उच्चतम न्यायालय ने अनेक बार इसका पक्ष लिया और अब मोदी पहली बार इसका पक्ष लेकर इस बारे में अगुवाई कर रहे हैं।

इसके अलावा लोकसभा में भाजपा का पूर्ण बहुमत है, हालांकि राज्यसभा में स्थिति उतनी अच्छी नहीं है, किंतु सदन के प्रबंधन से सरकार इस संहिता को पारित करा सकती है।

उच्च सदन अर्थात राज्यसभा में बहुमत के लिए 119 सदस्यों की आवश्यकता है, जबकि भाजपा और उसके सहयोगियों के 103 सदस्य हैं।

यदि एक निर्दलीय और पांच नाम-निर्देशित सांसदों को भी जोड़ दिया जाए तो भाजपा बहुमत से 10 के आंकड़े से दूर रह जाएगी।

‘आप’ और उद्धव ठाकरे की शिव सेना ने इस संहिता को समर्थन देने की मंशा व्यक्त की है। राज्यसभा में बीजद के 9 सदस्य हैं और वह भी इस संहिता को समर्थन दे सकती है, जो विपक्ष को और बांटेगा, जो फिलहाल एकजुट रहने का प्रयास कर रहा है। इसके अलावा राज्यसभा की 10 सीटों पर शीघ्र चुनाव होंगे।

समान नागरिक संहिता किस तरह पारित होगी? इस संहिता के समर्थक इसे लिंग समानता सुनिश्चित करने का मार्ग मानते हैं।

उदाहरण के लिए, भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत दो विवाह अवैध हैं, किंतु मुस्लिम पुरुषों को शरिया इस्लामी कानून के अंतर्गत चार विवाह करने की अनुमति है।

अनेक जनजातीय समुदायों में भी बहु-विवाह प्रथा जारी है और भाजपा द्वारा जनजातीय समुदायों तक पहुंचने के प्रयास के मद्देनजर यह एक मुद्दा बन सकता है।

यह विपक्ष के लिए भी कठिन डगर है। कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस बारे में अपने विचार तब व्यक्त करेगी, जब वह इस संबंधी विधेयक को देखेगी।

अन्य नेता भी समान नागरिक संहिता के संबंध में मोदी के बल देने का कड़ा विरोध नहीं कर रहे हैं, हालांकि उन्होंने इस संबंध में अपनी असहमति व्यक्त की है और इसे एक राजनीतिक दिखावा कहा है।

सरकार की नीतियों को विभाजनकारी बताते हुए उन्होंने इस विषय पर बहस की मांग की है जो इस संबंध में आगे बढऩे का सबसे सुरक्षित मार्ग है।

आशानुरूप ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने समान नागरिक संहिता को असंवैधानिक और अल्पसंख्यक विरोधी बताया है क्योंकि संविधान में प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म के अनुसार जीवन जीने का अधिकार दिया गया है और यह मौलिक अधिकारों का हिस्सा है।

कुछ लोग इसे संविधान के अंतर्गत स्वीकृत अधिकारों को सीमित कर भारत की बहुलता और धर्मनिरपेक्षता को कुचलने के प्रयास के रूप में देखते हैं।

उनका कहना है कि इससे भारत का हिन्दूकरण हो जाएगा तथा मुस्लिम और ईसाई खतरे में पड़ जाएंगे। तथापि रोचक तथ्य यह है कि इस बारे में मुस्लिम महिलाओं की मिली-जुली प्रतिक्रिया आ रही है।

संसद द्वारा तीन तलाक की प्रथा को अवैध, असंवैधानिक और इसे दंडनीय बनाए जाने के बाद अनेक मुस्लिम महिलाएं मोदी की समर्थक बन गई हैं और वे भाजपा को एक प्रबल शक्ति मानती हैं और उसको मत दे सकती हैं।

अनेक गण्यमान्य व्यक्तियों का कहना है कि समान नागरिक संहिता धर्म को सामाजिक संबंधों और पर्सनल कानूनों जैसे हिन्दू कोड बिल, शरिया कानून आदि से अलग कर देगी, जो कि विभिन्न धार्मिक समुदायों के धर्मग्रंथों, परंपराओं और परिपाटियों पर आधारित हैं।

इसके स्थान पर व्यक्तिगत मामलों, जैसे विवाह विच्छेद, दत्तक ग्रहण, उत्तराधिकार आदि के व्यक्तिगत मामलों में एक सामान्य कानून लाने से विविध सांस्कृतिक समूहों में सामंजस्य और एकरूपता बढ़ेगी, असमानता समाप्त होगी, महिला अधिकारों का संरक्षण होगा और लिंग समानता आधारित समाज का निर्माण होगा।

समान नागरिक संहिता कमजोर वर्गों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को संरक्षण तथा एकता के माध्यम से राष्ट्रीयता को बढ़ावा देगी।

आश्चर्य की बात यह है कि उदार मुसलमानों ने एक समान नागरिक संहिता पर मौन रहने का विकल्प चुना है।

अनेक इस्लामी देशों ने मुस्लिम पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध कर उसमें सुधार किया है ताकि इसका दुरुपयोग रोका जा सके।

सीरिया, मोरक्को, ट्यूनीशिया, ईरान और यहां तक पाकिस्तान में भी बहु-विवाह प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया है।

क्या इन लोगों को समान नागरिक संहिता को स्वेच्छा से समर्थन नहीं देना चाहिए? किंतु यह कहना आसान और करना कठिन है क्योंकि हमारा देश विविधतापूर्ण है, जहां पर विभिन्न धार्मिक कानून हैं, जो न केवल धर्म के अंतर्गत अलग-अलग पंथों में अलग-अलग हैं, अपितु जातियों, समुदायों में भी अलग-अलग हैं।

समान नागरिक संहिता के समर्थन और विरोध दोनों के सुर तेज होने के साथ साथ इसका सही समाधान मध्य मार्ग अपनाने में है।

तथापि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि एक समान नागरिक संहिता चुनावी दृष्टि से भाजपा को लाभ दिलाएगी क्योंकि इसका उपयोग विपक्ष को हाशिए पर ले जाने के लिए किया जाएगा, जिसे मुस्लिम समर्थक देखा जा रहा है।

अधिकतर हिन्दू इसे अपना एजैंडा लागू करने वाली पार्टी के रूप में देखेंगे। समान नागरिक संहिता भाजपा का मुख्य एजैंडा है और यह उसके 2019 के लोकसभा चुनावों के घोषणा पत्र में भी था।

निश्चित रूप से समान नागरिक संहिता की राह संवेदनशील और कठिन है, किंतु इस राह पर आगे बढ़ा जाना चाहिए और यदि संविधान की कुछ सार्थकता है तो इस संबंध में एक पहल की जानी चाहिए।

परंपराओं और परिपाटियों के नाम पर भेदभाव को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

इस संदर्भ में आगे क्या हो? किसी भी समुदाय को किसी भी प्रगतिशील विधान पर वीटो करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

समय आ गया है कि अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग कानूनों को अस्वीकार किया जाए और संविधान के अनुच्छेद 44 को लागू कर भारत में सुधार किया जाए।

अतीत में ही डूबे रहने से प्रगति नहीं हो सकती। भारत को एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है। 21वीं सदी में धर्म के आधार पर भारतीय विभाजित नहीं होने चाहिएं।

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