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खत्म हो जायेगा दांतों को बत्तीसी कहने का चलन

खत्म हो जायेगा दांतों को बत्तीसी कहने का चलन : दांतों को बत्तीसी कहने का चलन अब खत्म होता जा रहा है। इसके पीछे सिर्फ यह वजह नहीं है कि युवा आबादी इस शब्द से वाकिफ नहीं है, बल्कि एक बड़ी वजह यह है कि अब लोगों की बत्तीसी निकल …

By Hindi News 24x7 - News Editor
Last Updated: 21 मई, 2025
खत्म हो जायेगा दांतों को बत्तीसी कहने का चलन

खत्म हो जायेगा दांतों को बत्तीसी कहने का चलन :  दांतों को बत्तीसी कहने का चलन अब खत्म होता जा रहा है। इसके पीछे सिर्फ यह वजह नहीं है कि युवा आबादी इस शब्द से वाकिफ नहीं है, बल्कि एक बड़ी वजह यह है कि अब लोगों की बत्तीसी निकल ही नहीं रही है। 21वीं सदी में जन्म लेने वाले लोगों में बहुत बड़ी तादाद उन लोगों की है जिनके सिर्फ 28 दांत ही निकल रहे हैं।

कुछ समय पहले ही इस बारे में वाराणसी के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ डेंटल साइंस में सीनियर डेंटल एक्सपर्ट प्रोफेसर टीपी चतुर्वेदी ने एक स्टडी की है। इसके मुताबिक पिछले 20 साल से उनकी ओपीडी में आने वाले 25% युवाओं के सिर्फ 28 दांत ही निकल रहे हैं। 35% युवाओं को बड़ी मुश्किल से पूरे 32 दांत आ पाते हैं। ये दांत भी टेढ़े-मेढ़े निकलते हैं, जिन्हें ट्रीटमेंट कर ठीक करना पड़ता है।

25 साल की उम्र तक निकलता है 29 से लेकर 32वां दांत

प्रो. टीपी चतुर्वेदी ने बताया कि अमूमन 18-25 साल के बीच में लोगों के 29 से लेकर 32वां दांत निकलता है। इसे थर्ड मोलर दांत कहते हैं। आम बोलचाल की भाषा में इसे अक्ल ढाढ़ या विजडम टीथ भी कहा जाता है। ये जबड़े के सबसे पिछले हिस्से में होते हैं। खाना चबाने वाले दांत भी सिर्फ 8 रह गए है। डॉक्टर का कहना है कि पिछले 20 साल से 25% मरीजों के विजडम टीथ नहीं निकल रहे हैं। वहीं, एक और चौंकाने वाली बात भी सामने आई है। हमारे मुंह के अंदर खाना चबाने के लिए 12 दांत होते हैं, जिनकी संख्या भी अब घटकर आठ हो गई है। BHU Dental Research यानी अब लोगों को खाना चबाने में भी समस्या हो रही है। वैसे, सामने की ओर काटने के लिए 20 दांत होते हैं, उनमें कोई बदलाव नहीं है।

 जबड़ों का साइज होने लगा है छोटा

प्रोफेसर टीपी चतुर्वेदी कहते हैं कि कम दांत निकलने की यह समस्या शहरी युवाओं में ज्यादा देखने को मिल रही है। इसके पीछे वजह यह है कि नए जमाने के बच्चों ने दांत से कड़ी चीजें खानी कम कर दी हैं या फिर बंद कर दी हैं। पहले लोग भुना चना, भुट्टा और तमाम चीजें चबा-चबाकर खाया करते थे। गांव में अभी भी लोग ऐसा कर रहे हैं। मगर शहरों में अब वह सब बीते जमाने की बात हो गई है। प्रो. चतुर्वेदी ने बताया कि कम चबाने से अब हमारे जबड़ों का साइज छोटा होने लगा है। अक्ल दाढ़ उगने के लिए कोई स्थान ही नहीं बच रहा है ।

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