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The scary truth of online gaming: टास्क पूरा करने के लिए बेटे ने पिता की गर्दन पर रखा चाकू; नींद खुलने से टली अनहोनी

कैथल/करनाल (6 फरवरी 2026): मोबाइल और ऑनलाइन गेमिंग की लत बच्चों को किस हद तक हिंसक बना सकती है, इसका एक रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला हरियाणा के कैथल से सामने आया है। यहाँ एक किशोर ने ऑनलाइन गेम का एक ‘टास्क’ पूरा करने के लिए आधी रात को …

By Hindi News 24x7 - News Editor
Last Updated: 06 फ़र, 2026
The scary truth of online gaming: टास्क पूरा करने के लिए बेटे ने पिता की गर्दन पर रखा चाकू; नींद खुलने से टली अनहोनी

कैथल/करनाल (6 फरवरी 2026): मोबाइल और ऑनलाइन गेमिंग की लत बच्चों को किस हद तक हिंसक बना सकती है, इसका एक रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला हरियाणा के कैथल से सामने आया है। यहाँ एक किशोर ने ऑनलाइन गेम का एक ‘टास्क’ पूरा करने के लिए आधी रात को अपने ही पिता की गर्दन पर चाकू रख दिया। गनीमत रही कि वार करने से पहले पिता की नींद खुल गई, जिससे एक बड़ी त्रासदी होने से बच गई।

टास्क पूरा करने के लिए बेटे ने पिता की गर्दन पर रखा चाकू; नींद खुलने से टली अनहोनी

क्या है पूरा मामला? नागरिक अस्पताल के मानसिक रोग विभाग (Department of Psychiatry) के डॉ. विनय गुप्ता ने बताया कि करनाल के बल्ला गांव का एक परिवार अपने बेटे को इलाज के लिए अस्पताल लाया था।

 बच्चा एक ऐसे ऑनलाइन गेम का आदी हो चुका था जिसमें लेवल पार करने के लिए हिंसक टास्क मिलते हैं। गेम ने उसे आदेश दिया कि “पिता तुम्हारा दुश्मन (Enemy) है, उनकी गर्दन पर चाकू रखो।” खौफनाक रात: गेम के प्रभाव में आकर किशोर आधी रात को उठा, रसोई से चाकू लिया और सोते हुए पिता की गर्दन पर रख दिया। सौभाग्य से पिता की आंख खुल गई और उन्होंने बेटे को रोक लिया।

घरेलू हिंसा और डोपामाइन का असर काउंसलिंग के दौरान दो प्रमुख कारण सामने आए:

  1. घरेलू कलह: बच्चे के माता-पिता के बीच अक्सर झगड़े होते थे, जिसका गहरा असर उसके दिमाग पर पड़ा और वह गेम की दुनिया में सुकून तलाशने लगा।

  2. डोपामाइन का खेल: डॉ. गुप्ता ने बताया कि गेम में मिलने वाले वर्चुअल रिवॉर्ड दिमाग में ‘डोपामाइन’ (फील-गुड हार्मोन) का स्तर बढ़ा देते हैं। इससे बच्चे को असली और नकली दुनिया में फर्क समझ नहीं आता और वे सही-गलत का भान खो बैठते हैं।

अस्पताल में डॉक्टर नहीं, इलाज का संकट चिंताजनक बात यह है कि कैथल के नागरिक अस्पताल में पिछले एक साल से कोई स्थायी मनोचिकित्सक (Psychiatrist) नहीं है। गंभीर मरीजों को रोहतक पीजीआई रेफर करना पड़ता है। फिलहाल काउंसलर्स ही मरीजों को संभाल रहे हैं, जो गरीब परिवारों के लिए काफी नहीं है।

गाजियाबाद की घटना से जुड़े तार यह घटना अकेली नहीं है। हाल ही में यूपी के गाजियाबाद में कोरियन संस्कृति और गेमिंग के जुनून में तीन किशोरियों द्वारा आत्महत्या करने का मामला सामने आया था। अब कैथल की यह घटना बता रही है कि डिजिटल नशा बच्चों को अपराधी बना रहा है।

 

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