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बदलते देहरादून में शांत वादियों से बढ़ते अपराध और असुरक्षा की ओर बढ़ता शहर।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून कभी अपनी हरियाली, सुकूनभरे माहौल और सुरक्षित माहौल के लिए जानी जाती थी। लेकिन बीते कुछ सालों में शहर की तस्वीर तेजी से बदलती नजर आ रही है। बढ़ते अपराध, बढ़ता नाइट कल्चर और कानून व्यवस्था को लेकर उठते सवाल अब आम लोगों के मन में …

By Hindi News 24x7 - News Editor
Last Updated: 04 अप्र, 2026
बदलते देहरादून में शांत वादियों से बढ़ते अपराध और असुरक्षा की ओर बढ़ता शहर।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून कभी अपनी हरियाली, सुकूनभरे माहौल और सुरक्षित माहौल के लिए जानी जाती थी। लेकिन बीते कुछ सालों में शहर की तस्वीर तेजी से बदलती नजर आ रही है। बढ़ते अपराध, बढ़ता नाइट कल्चर और कानून व्यवस्था को लेकर उठते सवाल अब आम लोगों के मन में डर पैदा कर रहे हैं। खासतौर पर बुजुर्गों और महिलाओं के बीच असुरक्षा की भावना स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। हाल ही में एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी की हत्या जैसी घटनाओं ने शहर की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि उस बदलते माहौल की झलक है जिसे शहरवासी महसूस कर रहे हैं।

रात की रौनक या लोगों की बढ़ती परेशानी?
शहर के कई इलाकों में देर रात तक खुले रहने वाले रेस्टोरेंट, ढाबे और पब अब चर्चा का विषय बन चुके हैं। जहां एक ओर यह आधुनिक जीवनशैली का हिस्सा माने जाते हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोग इन्हें बढ़ती अव्यवस्था और असुरक्षा से जोड़कर देख रहे हैं। देर रात होने वाला शोर, नशे में हंगामा और संदिग्ध गतिविधियां लोगों की चिंता का कारण बन रही हैं।

कानून व्यवस्था पर उठते सवाल
स्थानीय निवासियों का मानना है कि पुलिस की मौजूदगी के बावजूद अपराधों पर पूरी तरह अंकुश नहीं लग पा रहा है। गश्त के बावजूद कई घटनाएं सामने आ रही हैं, जिससे लोगों का भरोसा कमजोर होता दिख रहा है। खासकर चेन स्नैचिंग और चोरी जैसी घटनाएं आम नागरिकों के लिए खतरा बनती जा रही हैं।

बढ़ती आबादी और ट्रैफिक का दबाव
देहरादून में तेजी से बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या ने भी शहर की व्यवस्था पर असर डाला है। प्रमुख सड़कों पर ट्रैफिक जाम और अव्यवस्था अब आम बात हो गई है। इसके साथ ही रफ ड्राइविंग ने सड़क सुरक्षा को एक नई चुनौती बना दिया है।

महिलाओं और बुजुर्गों की बढ़ती चिंता
शहर की बदलती स्थिति का सबसे ज्यादा असर महिलाओं और बुजुर्गों पर पड़ा है। पहले जहां वे बिना डर के बाहर निकलते थे, अब वही लोग अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क रहने लगे हैं। सुबह-शाम टहलना या अकेले बाहर जाना अब पहले जितना सहज नहीं रहा।

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