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धराली त्रासदी का सच: बादल फटने से हुई तबाही, झील टूटने की थ्योरी खारिज

देहरादून :खीरगंगा में आई ‘सुनामी’ की वजह अब लगभग साफ हो गई है। धराली को तबाह करने वाली यह पहाड़ी नदी किसी झील टूटने से विकराल नहीं हुई। इसके विकराल होने की वजह इसके कैचमेंट एरिया में बादल फटना और अत्यधिक वर्षा ही थी। जाने-माने भूगर्भ विज्ञानी डॉ. पीसी नवानी …

By Hindi News 24x7 - News Editor
Last Updated: 18 अग, 2025
धराली त्रासदी का सच: बादल फटने से हुई तबाही, झील टूटने की थ्योरी खारिज

देहरादून :खीरगंगा में आई ‘सुनामी’ की वजह अब लगभग साफ हो गई है। धराली को तबाह करने वाली यह पहाड़ी नदी किसी झील टूटने से विकराल नहीं हुई। इसके विकराल होने की वजह इसके कैचमेंट एरिया में बादल फटना और अत्यधिक वर्षा ही थी। जाने-माने भूगर्भ विज्ञानी डॉ. पीसी नवानी पहले ही यह मत जाहिर कर चुके थे। अब अन्य विशेषज्ञ भी किसी झील या ग्लेशियर लेक टूटने की बात को खारिज कर रहे हैं।

धराली

डॉ. नवानी ने इसकी वजह सीमित अवधि में अत्यधिक वर्षा से कैचमेंट एरिया में जमा मोरेन (ग्लेशियर पीछे हटने से जमा मलबा) का तेजी के साथ नीचे आना बताई थी। अब एसडीआरएफ की ओर से खीरगंगा के उद्गम श्रीकंठ पर्वत के आसपास और नदी के समूचे कैचमेंट एरिया की जारी तस्वीरें और वीडियो से भी इसकी पुष्टि हो रही है।

बीते 5 अगस्त की दोपहर उत्तरकाशी जिले की हर्षिल घाटी में गंगोत्री यात्रा के प्रमुख कस्बे धराली को खीरगंगा में आए सुनामी सरीखे प्रचंड उफान ने तबाह कर दिया। धराली बाजार तो पलक झपकते ही नक्शे से मिट गया। धराली का काफी बड़ा हिस्सा करीब 40-50 फीट ऊंचे मलबे में दब गया। महज कुछ पलों में सबकुछ तबाह कर देने वाली इस सुनामी की वजह शुरूआत में खीरगंगा के कैचमेंट एरिया में किसी झील के टूटने को माना गया था।

विशेषज्ञों की अलग राय

कुछ विशेषज्ञों ने ग्लेशियर लेक का टूटना इस प्रलय के पीछे की वजह मानी थी। लेकिन, विशेषज्ञों का एक वर्ग ऐसा भी था, जो शुरू से यह मान रहा था कि ग्लेशियर लेक टूटने जैसी किसी वजह से नहीं, बल्कि अत्यधिक वर्षा के कारण ऐसा हुआ। ग्लेशियर लेक टूटने जैसी थ्योरी को खारिज करने वालों में प्रमुख थे जाने-माने भूगर्भ विज्ञानी व जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (देहरादून) के पूर्व निदेशक डॉ. पीसी नवानी।

डॉ. नवानी का शुरू से मानना रहा कि खीरगंगा के कैचमेंट में अत्यधिक वर्षा (मसलन 1 घंटे में 100 मिलीमीटर से ज्यादा) ने यह हालात पैदा किए होंगे। इस तरह की बारिश के लिए ही आम बोलचाल में बादल फटना कहा जाता है। डॉ. नवानी का आकलन था कि ग्लेशियर काफी पीछे खिसक जाने के कारण खीरगंगा के कैचमेंट में बहुत बड़ी मात्रा में ग्लेशियर मोरेन (मलबा) जमा था, जो अत्यधिक वर्षा में लूज होकर पानी के साथ तेजी से नीचे आया। उस समय इसमें कम से कम 100 क्यूमेक्स (1 लाख लीटर प्रति सेकेंड) पानी 150 किलोमीटर की रफ्तार से दौड़ा होगा, जिसने धराली को तबाह किया।

एसडीआरएफ के सबूत से पुष्टि

अब इसी तरह के संकेत एसडीआरएफ की ओर से जारी ताजा तस्वीरों और वीडियो से मिल रहे हैं। एसडीआरएफ की ओर से जारी वीडियो व फोटोग्राफ्स पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भूगर्भ विज्ञानी डॉ. पीसी नवानी कहते हैं, “पहले मेरा आकलन था कि खीरगंगा में उफान किसी लेक टूटने से नहीं, अत्यधिक वर्षा से आया। अब यह पूरी तरह यकीन में बदल गया है, क्योंकि जो फोटो और वीडियो कैचमेंट एरिया से आए हैं, वे भी पूरी तरह मेरे आकलन की पुष्टि कर रहे हैं।”

डॉ. नवानी कहते हैं कि तस्वीरों और वीडियो में साफ दिख रहा है कि कैचमेंट में कितना मोरेन है। ग्लेशियर लेक के दूर-दूर तक कहीं कोई निशान नहीं हैं। वह कहते हैं कि राज्य सरकार की ओर से भेजे गए भूस्खलन शमन एवं प्रबंधन केंद्र के विशेषज्ञ दल ने भी ग्लेशियर लेक टूटने जैसी मान्यता को खारिज करते हुए अत्यधिक वर्षा को ही आरंभिक तौर पर वजह माना है। इस प्रकार, धराली की त्रासदी का वास्तविक कारण प्राकृतिक आपदा के रूप में आई अत्यधिक वर्षा और बादल फटना साबित हुआ है, न कि किसी झील या ग्लेशियर के टूटने से।

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