Menu
#Mumbai

उत्तराखंड: मदरसा बोर्ड खत्म कर ‘अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ का गठन; सरकार ने बताया शैक्षिक सुधार.

देहरादून: उत्तराखंड में धामी सरकार द्वारा ‘मदरसा शिक्षा बोर्ड’ को समाप्त कर उसकी जगह ‘उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ (USMEA) के गठन ने प्रदेश में एक नई सियासी और सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है। राज्य सरकार जहां इस कदम को मदरसों और अल्पसंख्यक संस्थानों को मुख्यधारा की आधुनिक शिक्षा …

By Hindi News 24x7 - News Editor
Last Updated: 20 फ़र, 2026
उत्तराखंड: मदरसा बोर्ड खत्म कर ‘अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ का गठन; सरकार ने बताया शैक्षिक सुधार.

देहरादून: उत्तराखंड में धामी सरकार द्वारा ‘मदरसा शिक्षा बोर्ड’ को समाप्त कर उसकी जगह ‘उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ (USMEA) के गठन ने प्रदेश में एक नई सियासी और सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है। राज्य सरकार जहां इस कदम को मदरसों और अल्पसंख्यक संस्थानों को मुख्यधारा की आधुनिक शिक्षा से जोड़ने का ऐतिहासिक सुधार बता रही है, वहीं मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे संस्थानों की संवैधानिक स्वायत्तता में दखलंदाजी करार दिया है।

उत्तराखंड: मदरसा बोर्ड खत्म कर ‘अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ का गठन; सरकार ने बताया शैक्षिक सुधार, विपक्ष ने उठाए स्वायत्तता पर सवाल

क्या है उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण? फरवरी 2026 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा इस नए प्राधिकरण का गठन किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य राज्य के मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में एकरूपता लाना और छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ना है। इसके तहत अल्पसंख्यक छात्रों को पारंपरिक शिक्षा के साथ-साथ विज्ञान, गणित, कंप्यूटर और कौशल विकास जैसे आधुनिक विषय पढ़ाए जाएंगे, ताकि उन्हें रोजगार के समान अवसर मिल सकें।

सरकार का पक्ष: पारदर्शिता और आधुनिकीकरण है मकसद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्पष्ट किया है कि सरकार का उद्देश्य किसी भी संस्था को बंद करना नहीं है, बल्कि व्यवस्था में पारदर्शिता लाना है। उन्होंने कहा कि डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने, वित्तीय लेनदेन में स्पष्टता लाने और शैक्षणिक मानकों की समीक्षा के लिए यह कदम उठाया गया है।

उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष मुफ्ती शमून कासमी ने भी सरकार के इस फैसले का समर्थन किया है। उन्होंने कहा, “कुछ लोग अपने स्वार्थ के कारण समाज में शंकाएं पैदा कर रहे हैं और भ्रम फैलाना दुर्भाग्यपूर्ण है। धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक विषयों का समावेश समय की मांग है। प्राधिकरण के माध्यम से शैक्षणिक गुणवत्ता, प्रशासनिक अनुशासन और जवाबदेही मजबूत होगी।”

विपक्ष का आरोप: स्वायत्तता पर प्रहार कांग्रेस ने सरकार की इस पहल पर गहरी चिंता व्यक्त की है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने आरोप लगाया कि संविधान का अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यक संस्थानों को अपनी संस्कृति की रक्षा और शैक्षणिक संस्थान संचालित करने की स्वायत्तता देता है। रावत ने कहा, “सरकार को कोई भी निर्णय लेने से पहले व्यापक संवाद करना चाहिए था। जिस जल्दबाजी में अल्पसंख्यकों के मामले में कदम उठाए जा रहे हैं, उसे पूरा देश देख रहा है।”

शिक्षाविदों और जानकारों की राय इस मुद्दे पर वरिष्ठ पत्रकार सुनील दत्त पांडेय का मानना है कि अनुच्छेद 29 और 30 के प्रावधानों के अनुरूप कई राज्यों में ऐसे प्राधिकरण काम कर रहे हैं, लेकिन उत्तराखंड में यह कितना कारगर साबित होगा, यह इसकी कार्यप्रणाली पर निर्भर करेगा।

वहीं, शिक्षाविद राजनीकांत शुक्ला का कहना है कि शिक्षा को राजनीतिक विवाद का विषय बनाने से बचना चाहिए। यदि इस प्राधिकरण से छात्रों के हितों की रक्षा होती है और शिक्षा की गुणवत्ता सुधरती है, तो इसका स्वागत होना चाहिए। हालांकि, उन्होंने माना कि सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अल्पसंख्यक समुदाय के बीच ‘विश्वास बहाली’ की है।


प्राधिकरण का संगठनात्मक ढांचा

सरकार ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के पदाधिकारियों की घोषणा कर दी है, जो इस प्रकार हैं:

  • अध्यक्ष: प्रोफेसर (सेवानिवृत्त) सुरजीत सिंह गांधी, बीएसएम पीजी कॉलेज रुड़की।

  • पदेन सदस्य सचिव: निदेशक, अल्पसंख्यक कल्याण उत्तराखंड।

  • पदेन सदस्य: महानिदेशक (विद्यालयी शिक्षा उत्तराखंड) और निदेशक (राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद उत्तराखंड)।

  • नामित सदस्य: * प्रोफेसर डॉ. राकेश कुमार जैन (गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार)

    • डॉ. सैय्यद अली हमीद (सेवानिवृत्त प्रोफेसर, कुमाऊं विवि, अल्मोड़ा)

    • प्रो. पेमा तेनजिन (ग्वालदम, चमोली)

    • प्रो. गुरमीत सिंह (केजीके पीजी कॉलेज, मुरादाबाद)

    • डॉ. एल्बा मन्ड्रेले (राजकीय पीजी कॉलेज कपकोट, बागेश्वर)

    • प्रो. रोबिना अमन (रसायन विज्ञान विभागध्यक्ष, सोबन सिंह विश्वविद्यालय, अल्मोड़ा)

    • चंद्रशेखर भट्ट (सेवानिवृत्त सचिव, उत्तराखंड शासन)

    • राजेंद्र सिंह बिष्ट (हिमालय ग्राम विकास समिति, पिथौरागढ़)

 

Tagged:
Share This Article