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आखिर भारत पर क्यों हैं अमेरिका, लट्टू:

प्रधानमंत्री मोदी की यह 8वीं अमरीकी यात्रा है, जो ऐसे समय पर हो रही है, जब दोनों देश तेजी से बदलती दुनिया में अवसरों के साथ कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। बीते 75 वर्षों में जब भी किसी स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री ने अमरीका की यात्रा की, तब …

By Hindi News 24x7 - News Editor
Last Updated: 22 जून, 2023
आखिर भारत पर क्यों हैं अमेरिका, लट्टू:

प्रधानमंत्री मोदी की यह 8वीं अमरीकी यात्रा है, जो ऐसे समय पर हो रही है, जब दोनों देश तेजी से बदलती दुनिया में अवसरों के साथ कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

बीते 75 वर्षों में जब भी किसी स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री ने अमरीका की यात्रा की, तब दोनों के भीतर हलचल बढऩा सामान्य बात रही है।

परन्तु प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा, अमरीका के राजनीतिक और नीतिगत समुदाय में दो कारणों से अभूतपूर्व हो गई है।

एक-अमरीकी संसद में दोनों सदनों के नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री मोदी को दूसरी बार कांग्रेस की संयुक्त बैठक को संबोधित करने का निमंत्रण मिला है।

उनसे पहले अमरीका ने यह सम्मान केवल दो बार ब्रिटिश प्रधानमंत्री रहे विंस्टन चॢचल, दक्षिण अफ्रीका के पहले राष्ट्रपति नैल्सन मंडेला और दो इसराईली प्रधानमंत्रियों (नेतन्याहू-राबिन) को दिया था।

दूसरा-बाइडेन प्रशासन के अढ़ाई वर्ष के कार्यकाल में इस प्रकार का उच्चतम राजनयिक स्वागत (राजकीय भोज सहित), फ्रांसीसी और दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपतियों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए हो रहा है।

यह आदर-सत्कार केवल व्यक्तिगत नहीं, अपितु एक राष्ट्र के रूप में भारत के प्रति आए आमूल-चूल वैश्विक परिवर्तन को रेखांकित करता है।

अमरीका घोषित रूप से विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक और सामरिक शक्ति है। वहीं सर्वाधिक जनसंख्या वाला भारत दुनिया की सबसे तेज आॢथक प्रगति के साथ ब्रिटेन को पीछे छोड़कर जर्मनी को पछाडऩे के मार्ग पर प्रशस्त है और दुनिया की बड़ी सामरिक ताकतों में से एक है।

विदेशी आक्रांताओं के घृणा प्रेरित चिंतन और गुलाम मानसिकता से ग्रस्त पूर्ववर्ती दृष्टिकोण को तिलांजलि देकर नया भारत, बाह्य मापदंड-एजैंडे के अनुरूप चलने के बजाय अपने हितों को केंद्र में रखकर शेष विश्व के लगभग सभी सभ्य देशों (अमरीका सहित) से अपनी शर्त पर संबंध प्रगाढ़ कर रहा है।

अमरीका प्रदत्त वैश्विक प्रतिबंधों के बाद भी अप्रैल 2022 से भारत न केवल रूस से कच्चा तेल खरीद रहा है, साथ ही वह देश का दूसरा बड़ा तेल आपूर्तिकत्र्ता भी बन गया है।

इस वर्ष मई में भारत ने रूस से 19.6 लाख बैरल तेल का आयात किया था, जो अप्रैल की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक है।

यक्ष प्रश्न है कि जिस अमरीका ने 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद भारत पर कई पाबंदियां थोपी थीं, वह उसके साथ निकटता बढ़ाने को क्यों व्याकुल है? क्या इसका एकमात्र कारण दोनों देशों का विस्तारवादी चीन के साथ हालिया गतिरोध है?

वर्ष 2000 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के दौर से दोनों देशों के संबंधों को नया आयाम मिला है।

वर्ष 2008 में भारत-अमरीका के बीच असैन्य परमाणु सहयोग समझौता हुआ। फिर वर्ष 2009 में राष्ट्रपति ओबामा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को अपने प्रशासन के पहले राजकीय आगंतुक के रूप में आमंत्रित किया।

इसके अगले वर्ष भारत यात्रा पर आए ओबामा ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए समर्थन व्यक्त किया, बाद में ‘मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था’ और एक बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्था (वासेनार) में भारत की सदस्यता पर सफलतापूर्वक काम भी किया।

प्रधानमंत्री मोदी के निमंत्रण पर ओबामा वर्ष 2015 की गणतंत्र दिवस परेड में मुख्य अतिथि के रूप में आए थे। ट्रंप प्रशासन में अन्य उच्च-स्तरीय प्रौद्योगिकी क्षेत्र में सफलताओं के बीच भारत-अमरीका के संबंध और अधिक प्रगाढ़ हुए।

वर्तमान राष्ट्रपति बाइडेन ने भारत, आस्ट्रेलिया, जापान केन्द्रित क्वाड को नए स्तर पर पहुंचाकर ‘आई.-2-यू.-2’ (भारत, इसराईल, यू.ए.ई., यू.एस.) नामक नए बहुपक्षीय मंच का गठन किया, जिसमें भारतीय हितों को स्वीकार्यता मिली।

इसी वर्ष 7 मई को अमरीका, भारत, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (एन.एस.ए.) ने इसी समूह के अंतर्गत अपनी पहली बैठक की थी।

इससे पहले, 31 जनवरी को भारत-अमरीका एन.एस.ए. ने वाशिंगटन में ‘इनिशिएटिव फॉर क्रिटिकल एंड एमर्जिंग टैक्नोलॉजीज’ (आईसैट) का विमोचन किया था, जिसने दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को नए स्तर पर पहुंचा दिया।

इस समय भारत-अमरीका किसी भी अन्य गैर-संबद्ध देशों की तुलना में अधिक सैन्य अभ्यास कर रहे हैं।

बीते डेढ़ दशक में भारत, अमरीका से 20 अरब डॉलर से अधिक की रक्षा आपूर्ति खरीदने का अनुबंध कर चुका है, तो अब वह तीन अरब डॉलर के सशस्त्र ड्रोन आपूर्ति को अंतिम रूप देना चाहता है।

दोनों देश रक्षा प्रौद्योगिकी सहयोग और जी.ई. जैट इंजन प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण हेतु समझौते पर भी काम कर रहे हैं।

कुछ अमरीकी सांसद ‘नाटो प्लस’ में भारत को शामिल करने का सुझाव दे रहे हैं। भारत की वर्तमान विदेश नीति रणनीतिक स्वायत्तता और स्वतंत्रता पर आधारित है, इसलिए भारत के लगभग सभी देशों से अच्छे संबंध हैं।

जहां भारत ‘क्वाड’ का सदस्य है, तो वह ‘शंघाई सहयोग संगठन’ का भी हिस्सा है।

भारत को ‘जी7’ बैठक में निमंत्रित किया जाता है, तो वह ‘ब्रिक्स’ का भी अंग है। वास्तव में, ‘नाटो प्लस’ का दांव, एशिया में विस्तारवादी चीन पर अंकुश लगाने हेतु भारत का मात्र एक साधन बनाने का उपक्रम है, जिससे भारतीय नेतृत्व अवगत है।

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