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अमेरिका को भारत के साथ अपने संबंधों में सचमुच प्रगाढ़ता लानी है तो उसे भारत की चिंताओं को गहराई से समझना होगा:

प्रधानमंत्री मोदी विश्व के चुनिंदा नेताओं में होंगे, जो अमेरिकी संसद को दो बार संबोधित करेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने मोदी की इस यात्रा को लेकर तब अपना उत्साह प्रदर्शित कर दिया था। जब उन्होंने जापान में कहा था कि आप बहुत लोकप्रिय हैं और मुझे आपका आटोग्राफ लेना …

By Hindi News 24x7 - News Editor
Last Updated: 19 जून, 2023
अमेरिका को भारत के साथ अपने संबंधों में सचमुच प्रगाढ़ता लानी है तो उसे भारत की चिंताओं को गहराई से समझना होगा:

प्रधानमंत्री मोदी विश्व के चुनिंदा नेताओं में होंगे, जो अमेरिकी संसद को दो बार संबोधित करेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने मोदी की इस यात्रा को लेकर तब अपना उत्साह प्रदर्शित कर दिया था।

जब उन्होंने जापान में कहा था कि आप बहुत लोकप्रिय हैं और मुझे आपका आटोग्राफ लेना चाहिए।

बाइडन ने प्रधानमंत्री मोदी से यह भी कहा था कि उन्हें एक अजीबोगरीब चुनौती से जूझना पड़ रहा है कि आपके आगमन पर जो स्वागत भोज रखा है।

उसमें शामिल होने के लिए पूरा देश उमड़ रहा है और हमारे पास अब आमंत्रण पत्र नहीं बचे हैं। अमेरिका में भारत की महत्ता इसीलिए बढ़ती जा रही है, क्योंकि वहां रह रहे भारतीयों का अमेरिकी राजनीति, आर्थिकी, व्यापार-उद्योग एवं सामाजिक संरचना में दखल बढ़ गया है।

जनसंख्या के लिहाज से अमेरिका में 40 लाख के करीब ही भारतीय हैं, पर अमेरिकी समाज में उनकी धमक कहीं ज्यादा है।

बाइडन प्रशासन में भारतीय मूल के लोगों की भरमार है। इस कारण भी प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा को लेकर इतना उत्साह है।

भारत-अमेरिका संबंध बीते एक दशक में तेजी से आगे बढ़े हैं और उनमें गुणात्मक परिवर्तन आया है। इसका एक प्रमुख कारण अमेरिका और चीन के लगातार खट्टे होते संबंध हैं।

अमेरिका की तरह भारत भी चीन के आक्रामक रवैये से परेशान है। वह भी उसे लेकर उतना ही सचेत है, जितना अमेरिका, भारत चीन की आक्रामकता का सामना करने के लिए न केवल सीमाओं पर अपने आधारभूत ढांचे को सुदृढ़ कर रहा है, बल्कि सीमा पर कहीं अधिक सैन्य बल भी तैनात कर रहा है।

दुर्गम सीमा की रक्षा के लिए उच्च तकनीक के साथ जो हथियार चाहिए, उन्हें अमेरिका देने के लिए इच्छुक दिख रहा है।

यह एक विडंबना ही है कि अमेरिका के साथ भारत के संबंध रक्षा सौदों पर आकर टिक जाते हैं। भारतीय प्रधानमंत्रियों की अमेरिका यात्रा के पहले बड़े रक्षा सौदों की घोषणा होती रही है।

इस बार भी ऐसा ही होता दिख रहा है। इस बार आधुनिक ड्रोन रीपर को लेकर सौदा हो सकता है।

अमेरिका का भारत के प्रति झुकाव इसीलिए बढ़ रहा है, क्योंकि वाशिंगटन और बीजिंग के आर्थिक रिश्तों में लगातार गिरावट आ रही है।

चीन अपनी मुद्रा का मूल्य जानबूझकर कम रख रहा है । इसके कारण व्यापार संतुलन उसके पक्ष में है । यही स्थिति भारत के मामले में भी है।

चीन का जैसे-जैसे आर्थिक आधिपत्य बढ़ रहा, वैसे वैसे वह अपना विस्तारवादी एजेंडा भी आगे बढ़ा रहा है। वह पड़ोसी ताइवान को हड़पने की कोशिश कर रहा है।

दक्षिण चीन सागर में अपने विस्तारवादी एजेंडे पर चल रहा है। उसके इस एजेंडे से भारत समेत अन्य पड़ोसी देश परेशान हैं।

अमेरिका चीन को काबू में करने के लिए भारत का सहारा अवश्य ले रहा है, लेकिन भारत ने यह स्पष्ट कर कर दिया है कि अमेरिका से उसके रिश्ते उसकी अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर आधारित होंगे।

आने वाले समय में चीन की विकास दर धीरे-धीरे कम होगी और भारत की बढ़ेगी और वह अमेरिका के लिए एक बेहतर बाजार के रूप में सामने आएगा।

दोनों देशों के रिश्तों में गहराई तब आएगी जब अमेरिका खुलकर भारत के समर्थन में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए पैरवी करेगा ।

विव शांति और संतुलन के लिए यह अति आवश्यक है कि भारत की बढ़ती हुई आर्थिक एवं कूटनीतिक शक्ति को सम्मान मिले।

वैसे तो कई छोटे-बड़े देश भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने के पक्ष में हैं, पर चीन आनाकानी कर रहा है। इसकी काट अमेरिका और अन्य स्थायी सदस्य मिलकर निकाल सकते हैं।

अमेरिका और भारत जिन अनेक मुद्दों पर एकमत हैं, उनमें आतंकवाद से निपटना भी है। आतंकवाद आज भी विश्व शांति के लिए एक बड़ी चिंता का कारण है।

भारत के लिए यह इसलिए अधिक है, क्योंकि पड़ोसी देश पाकिस्तान आतंकवाद का एक बड़ा गढ़ है। पाकिस्तान आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर देश के रूप में सामने आ रहा है, लेकिन कश्मीर को लेकर उसके इरादे अभी भी आक्रामक हैं।

अमेरिका आतंकवाद को लेकर चिंता तो जताता है, पर पाकिस्तान को आतंक का समर्थन करने के लिए दंडित नहीं करना चाहता हैं।

अफगानिस्तान में पाकिस्तान के रवैये के कारण नाकामी और बदनामी से दो-चार होने के बाद भी अमेरिका उसे नसीहत देने तक सीमित है।

कश्मीर में पाकिस्तान के हस्तक्षेप पर भी अमेरिका ढुलमुल रवैया दिखाता है। अगर अमेरिका को भारत के साथ अपने रिश्तों में सचमुच प्रगाढ़ता लानी है तो उसे भारत की चिंताओं को गहराई से समझना होगा और अपनी पाकिस्तान नीति में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा।

यह ठीक है कि अभी तक बाइडन प्रशासन ने भारत के आंतरिक मामलों में दखल नही दिया है, लेकिन यदि वह दोनों देशों को और निकट लाना चाहता है, तो उसे भारत की चिंताओं को सही तरह समझना होगा।

इससे ही दोनों देशों में वह भरोसा कायम होगा, जिसकी आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा के पहले राहुल गांधी भी वहां गए थे। उन्होंने वहां भारत की आंतरिक स्थिति को लेकर एक गलत धारणा पेश की।

अमेरिका ने आधिकारिक रूप से उन्हें महत्व नहीं दिया, लेकिन कुछ अमेरिकी सांसदों और सिविल सोसायटी के लोगों संग भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों ने उन्हें सुना ।

अमेरिका का राजनीतिक वर्ग और तथाकथित निष्पक्ष मीडिया अक्सर मोदी शासन के बारे में वही सोच रखता है, जो कांग्रेस और राहुल गांधी रखते रहे हैं।

मोदी सरकार की अनावश्यक आलोचना अमेरिकी मीडिया की आदत है। वह मोदी के मामले में उसी अंधविरोध से ग्रस्त है, जिससे राहुल गांधी हैं।

यह ठीक नहीं कि मोदी शासन के नौ वर्ष बाद भी अमेरिका भारत की आंतरिक राजनीति के बारे में वैसी ही समझ रखे, जैसी वह कांग्रेस के जमाने में रखता था ।

अमेरिका के कई थिंक टैंकों, कुछ सांसदों और मीडिया के एक हिस्से को मोदी के नेतृत्व में बदलते भारत और उसकी आकांक्षा को सही तरह समझना होगा। इससे ही दोनों देश और निकट आएंगे।

 

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